
जिला उपभोक्ता आयोग जांजगीर-चांपा : अनिता सिदार बनाम महादेव बिल्डर्स
जिला उपभोक्ता आयोग जांजगीर-चांपा (छ०ग०) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में महादेव बिल्डर्स एवं कंस्ट्रक्शन के प्रोपराइटर विजय पटेल को सेवा में कमी का दोषी पाया है। यह निर्णय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 35 के तहत दायर परिवाद प्रकरण क्र. DC/379/CC/71/2024 पर दिनांक 28/10/2025 को सुनाया गया।
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क्या था मामला
परिवादिनी ग्राम भजपुर निवासी अनिता सिदार उर्फ अन्नू ने महादेव बिल्डर्स को अपनी 1,726 वर्गफुट भूमि पर दो मंजिला मकान बनाने का ठेका 22.01.2022 को दिया था। निर्माण की लागत सामग्री सहित 1,350/- प्रति वर्गफुट तय हुई थी। अनिता सिदार ने 29.01.2022 से 26.01.2023 तक बिल्डर को कुल 42,79,600/- का भुगतान किया था ।
सेवा में कमी और आदेश
परिवाद में बताया गया कि बिल्डर ने मकान निर्माण में आधारभूत त्रुटियां कीं, जैसे- छज्जे का निर्माण न करना, बारिश में पानी भरना, खिड़की से पानी आना, ड्रेन पाईप और वायरिंग में खराबी, और छत से सीपेज की समस्या । इसके बावजूद बिल्डर ने शिकायतें ठीक करने के बजाय 13 महीने तक टालमटोल किया ।
विरूद्ध पक्षकार, महादेव बिल्डर्स, के अनुपस्थित रहने के कारण, विरोधी पक्षकार के विरूद्ध एकपक्षीय कार्यवाही करते हुए आयोग ने परिवादिनी के तथ्यों पर विश्वास किया। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि बिल्डर ने गुणवत्तापूर्ण कार्य न कर सेवा में कमी की है ।
आयोग का फैसला – अनिता सिदार बनाम महादेव बिल्डर्स
आयोग ने परिवाद को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए महादेव बिल्डर्स को निम्नलिखित आदेश दिए, जिनका पालन आदेश दिनांक से 45 दिनों के भीतर करना होगा
सुधार कार्य- मकान में खिड़की की ग्रिल, छज्जा, ड्रेन पाईप, वायरिंग, और छत के सीपेज सहित सभी त्रुटियों को अनिता सिदार की संतुष्टि के अनुसार सुधारना होगा।
मानसिक क्षतिपूर्ति- मानसिक संताप के लिए 10,000/- का भुगतान।
वाद व्यय के रूप मे परिवादिनी को 5,000/- का भुगतान।
ब्याज- यदि 45 दिनों में भुगतान नहीं किया जाता है, तो संपूर्ण आदेशित राशि पर 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा ।
इस फैसले ने उपभोक्ताओं को यह संदेश दिया है कि निर्माण में गुणवत्ता की कमी या कार्य पूरा न करने पर कानूनी कार्यवाही से राहत मिल सकती है।
जिला उपभोक्ता आयोग जांजगीर-चांपा – अभिषेक कुमार पटेल बनाम केरला टायर्स
प्रकरण क्र. DC/379/CC/60/2025
प्रस्तुति दिनांक (ऑनलाइन)- 24/06/2025
आदेश पारित दिनांक 22/10/2025
परिवादी का पक्ष
परिवादी ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 35 के अंतर्गत सेवा में कमी के आधार पर शिकायत दर्ज की।
घटनाक्रम- परिवादी 24.06.2024 को अपने ट्रैक्टर के बड़े टायर के ग्रीफ निकलने के कारण केरला टायर्स के पास रिपेयरिंग के लिए गया था।
टायर की अदला-बदली और वारंटी- विरुद्ध पक्षकार ने रिपेयरिंग न करके, उसी तारीख को 17,000/- कीमत का एक अन्य टायर एक्सचेंज में दिया। परिवादी का दावा था कि इस टायर पर एक वर्ष की वारंटी रबर खराब होने पर दी गई थी।
शिकायत- 5-6 माह चलने के बाद टायर का रबर निकल गया और उसमें दरारें आने लगीं। विरुद्ध पक्षकार मरम्मत के लिए टालमटोल करता रहा (आज आना कल आना)।
दावा की गई क्षतिपूर्ति (अनुतोष)-
टायर की रकम- 17,000/-
ट्रैक्टर 5-6 माह तक खड़े रहने के कारण नुकसानी- लगभग 1,00,000/-
आर्थिक क्षति- 10,000/-
मानसिक पीड़ा- 10,000/-
विरुद्ध पक्षकार का पक्ष (केरला टायर्स)-
विरुद्ध पक्षकार ने परिवाद के सभी अभिकथनों से इनकार किया।
मुख्य तर्क
वे केवल टायर पंचर और रिपेयरिंग का कार्य करते हैं, टायर विक्रय का कारोबार नहीं करते हैं और न ही किसी कंपनी के एजेंट हैं।
परिवादी द्वारा लाया गया टायर रिपेयरिंग लायक नहीं था (बीच से कटा फटा था)।
परिवादी ने अपने क्षतिग्रस्त टायर के बदले दो पुराना टायर बदली में लिया था, जिसके लिए उसने नया टायर (30-35 हजार) उपलब्ध न होने की बात कही थी।
उन्होंने कोई वारंटी या खराबी की जिम्मेदारी का आश्वासन कभी नहीं दिया। परिवादी ने ट्रैक्टर का उपयोग भिन्न प्रयोजन में किया था।
आयोग का निष्कर्ष एवं फैसला- अभिषेक कुमार पटेल बनाम केरला टायर्स
आयोग ने दोनों पक्षों के तर्कों, शपथ पत्रों और दस्तावेजों की जाँच की।
दस्तावेज़ विश्लेषण-
परिवादी द्वारा प्रस्तुत टायर का बिल (प्रदर्श सी-1) जीएसटी बिल नहीं था और न ही उस पर दुकान की सील लगी थी।
बिल के पर्टीकुलर कॉलम में “Two 13X6U28 Tyre EUchenge Charge” और राशि 17,000/- लिखी थी, साथ ही “One Year Warranty For Rubber Only” भी लिखा था।
सबसे महत्वपूर्ण, बिल में टायर का नंबर (जिससे टायर की पहचान होती है) नहीं लिखा हुआ था, जिससे यह स्पष्ट नहीं हुआ कि यह टायर ट्रैक्टर के इंजन के लिए था।
परिवादी ने ट्रैक्टर का पंजीकरण क्रमांक या स्वामित्व से संबंधित कोई दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किया।
न्यायिक सिद्धांत- आयोग ने ’’रनवीत सिंह बग्गा बनाम के. एल. एम. रायल डच एयर लाईन्स 2000’’ (1) माननीय उच्चतम न्यायालय 66 के मामले का उल्लेख किया, जिसमें यह निर्धारित किया गया है कि सेवा में कमी साबित करने का भार आरोप लगाने वाले (परिवादी) पर होता है।
अंतिम निर्णय- परिवादी विरुद्ध पक्षकार पर लगाए गए सेवा में कमी या अनुचित व्यापारिक व्यवहार के आरोप को साबित करने में सफल नहीं हो पाया।
परिणाम- चूँकि परिवादी, केरला टायर्स पर सेवा में कमी या अनुचित व्यापारिक व्यवहार के आरोपों को प्रमाणित नहीं कर सका, इसलिए आयोग ने विचारणीय प्रश्नों को अप्रमाणित मानते हुए परिवाद को अस्वीकार करके खारिज कर दिया। इस निर्णय के साथ, दोनों पक्षों को अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करने का निर्देश दिया गया।
क्या आप इस मामले के कानूनी पहलुओं या उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 35 के बारे में अधिक जानकारी जानना चाहेंगे?
जिला उपभोक्ता आयोग जांजगीर-चांपा – पुष्पराज सिंह बनाम पीनल उपवेजा
(उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत सेवा में कमी का मामला)
ज़िला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, जांजगीर-चांपा (छत्तीसगढ़) ने 22 अक्टूबर 2025 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए, एक छात्र द्वारा हॉस्टल संचालक के खिलाफ दायर शिकायत को खारिज कर दिया। यह मामला, जिसका क्रमांक DC/379/CC/25/2025 था, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत दायर किया गया था।
मामले के मुख्य पक्षकार
परिवादी (Complainant)- पुष्पराज सिंह, उम्र 19 वर्ष, निवासी ग्राम जगहमंत, ज़िला जांजगीर-चांपा।
विरूद्ध पक्षकार (Opposite Party)- पीनल उपवेजा, उम्र 45 वर्ष, जो बिलासपुर में श्री गायत्री गर्ल्स हॉस्टल एवं मेंस का संचालन करते हैं।
परिवादी पुष्पराज सिंह ने हॉस्टल संचालक के विरूद्ध सेवा में कमी (Deficiency in Service) का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज की थी। आयोग की पीठ, जिसमें अध्यक्ष श्री प्रशांत कुन्ड और सदस्य श्री विशाल तिवारी एवं श्रीमती महिमा सिंह शामिल थे, ने मामले की सुनवाई की।
जिला उपभोक्ता आयोग जांजगीर-चांपा का निष्कर्ष और निर्णय- पुष्पराज सिंह बनाम पीनल उपवेजा
अंतिम तर्कों और प्रस्तुत साक्ष्यों की समीक्षा के बाद, आयोग ने पाया कि परिवादी द्वारा लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं किए जा सके। रिकॉर्ड से यह तथ्य प्रमाणित हुआ कि परिवादी ने विरुद्ध पक्षकार के हॉस्टल का उपयोग लगभग 3 माह की अवधि तक किया था।
आयोग ने अपने फैसले में यह दोहराया कि सेवा में कमी या दोष साबित करने का भार आरोप लगाने वाले पक्ष पर होता है (इस संबंध में “माननीय उच्चतम न्यायालय“ के एक पूर्व निर्णय का भी उल्लेख किया गया)। चूंकि परिवादी, हॉस्टल संचालक के खिलाफ किसी भी प्रकार की सेवा में कमी या लापरवाही सिद्ध करने में सफल नहीं हो सका, इसलिए आयोग ने इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि विरुद्ध पक्षकार द्वारा परिवादी के प्रति किसी भी प्रकार की सेवा में कमी नहीं की गई थी।
परिणामस्वरूप, ज़िला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने परिवादी पुष्पराज सिंह द्वारा दायर शिकायत को खारिज (Dismissed) करने का आदेश पारित किया।
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